Wednesday, July 16, 2008

नाम संस्क्रति

आज सुबह मै जब अपने एक मित्र की दुकान पर कुछ देर के लिए बेठा था मुझे यह बोल कर कि वह अभी आ रहा है कहकर वो चला गया। उसके जाने के कुछ देर बाद एक ग्राहक आया। शक्ल एवँ सूरत से वह ग्रामीण प्रतीत हो रहा था उम्र तकरीबन 25 साल। उस से कुछ देर तक बात करने के बाद मुझे अपना नाम बताया, उसका नाम क्रिश था। मुझे आश्चर्य हुआ कि एक छोटे से गाव मे रहने वाले युवाओ के नाम मारडन हो गये हैं। कहाँ गये हमारी सँस्क्रति के वे नाम जो किसी महापुरुष , भगवान या किसी महान सत्य के प्रतीक होते थै उदाहरण के लिये सुरेन्द्र हरेन्द्र सत्यप्रकाश रामगोपाल मुकेश इत्यादि नामो का प्रचलन शायद खत्म होता जा रहा हैँ । आज कल के युवाओ को अब भारत की प्राचीन सँस्क्रति के प्रतीक ऐसे नामौ का शायद महत्व नही पता.........? पुराकाल मे कुछ नाम स्वभाव का प्रतीक दिखाई देते थे जैसे कि क्रपणदास । कुछ नाम सामाजिक हेसियत प्रदान करते थॅ धनीराम गरीबदास। लडका काला है या गोरा तो कई बार उसका नाम करुआ या भूरा पड जाता था। इसी क्रम मे देवी देवताओ के भी नाम आते परन्तु देवी देवताओ के भी नाम एवँ उपनाम रखने के पीछे वास्तविक कारण प्रात:काल मे स्मरण करना एवँ नामधारी के अन्दर उक्त देवी देवताओ के जैसे गुणो का विकास भी करना था जिसमे हमारी बुजुर्ग पीढी काफी हद तक सफल भी रहीँ

Wednesday, May 28, 2008

प्रथम प्रयास

॥ॐ हरि ॐ॥ आज यहाँ पर दोपहर 2 बजे से तेज आँन्धी ओर उसके पश्चात पानी गिरने लगा तो सोचा क्यू ना आज अपना ब्लाग बनाया जाय। ब्लाग बनाने के बाद सोचा कि ब्लाग मे क्या लिखा जाय "पुरानी यादेँ" और "बिखरे पन्ने" के बीच मे केवल "यादे" ही वाँकी रह पाती हैं अब जब यादेँ की बात ही चल रही है तो क्यू ना कुछ बीती बिसरी बाते को ही याद कर लिया जाय। यूँ तो हमे ब्लाग लिखने का अनुभव भी नही है परन्तु हमने सुना है कि "करत करत अभ्यास ते जडमत होय सुजान" कहने को तो बहुत कुछ है लेकिन सव कुछ एक साथ तो नही लिख सकते ना, एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ जो कि शायद भविष्य मे काम आ सकता है।